डोनाल्ड ट्रंप का ईरान समझौता और विरोधियों पर उनका गुस्सा क्यों सही है

डोनाल्ड ट्रंप का ईरान समझौता और विरोधियों पर उनका गुस्सा क्यों सही है

डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे अपनी ही पार्टी के लोगों से भिड़ने में जरा भी संकोच नहीं करते। वर्साय में जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान ईरान के साथ हुए 14 सूत्रीय समझौते पर अमेरिका में ही राजनीतिक घमासान मच गया है। ट्रंप ने विरोधियों को सीधे तौर पर 'बेवकूफ, जलनखोर और बुरे लोग' कह दिया है। यह कोई सामान्य राजनीतिक बयानबाजी नहीं है। यह ट्रंप की उस विदेश नीति का हिस्सा है जो सीधे नतीजों पर भरोसा करती है, न कि पुरानी घिसी-पिटी रणनीतियों पर।

जब पूरी दुनिया तेल की बढ़ती कीमतों और युद्ध के डर से कांप रही थी, तब ट्रंप ने एक ऐसा दांव खेला जिसने सबको चौंका दिया। इस समझौते के तुरंत बाद अमेरिकी शेयर बाजार ने नया रिकॉर्ड बनाया। कच्चे तेल की कीमतें जो कभी 120 डॉलर प्रति बैरल के शिखर पर थीं, वे गिरकर 90 डॉलर के मध्य में आ गईं। आम अमेरिकी जनता के लिए यह सीधे तौर पर राहत की बात है। लेकिन इसके बावजूद वाशिंगटन के कुछ गलियारों में इस समझौते का विरोध हो रहा है।

ईरान डील पर ट्रंप का गुस्सा और सच क्या है

सच्चाई यह है कि ट्रंप हमेशा से खुद को एक बेहतरीन 'डीलमेकर' मानते आए हैं। उनका कहना है कि जो लोग इस समझौते की आलोचना कर रहे हैं, वे या तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को नहीं समझते या फिर वे सिर्फ राजनीतिक द्वेष के कारण ऐसा कर रहे हैं। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि बाजार रिकॉर्ड ऊंचाई पर है और तेल की कीमतें लगातार गिर रही हैं। ऐसे में जो लोग यह कह रहे हैं कि ईरान पर पर्याप्त कड़ाई नहीं बरती गई, वे पूरी तरह गलत हैं।

ईरान के साथ हुए इस नए समझौते का उद्देश्य केवल परमाणु कार्यक्रम को रोकना नहीं है, बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता को बनाए रखना भी है। आलोचक कह रहे हैं कि ट्रंप ईरान के सामने झुक गए हैं। लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। ट्रंप प्रशासन ने साफ किया है कि अगर ईरान ने शर्तों का उल्लंघन किया, तो उस पर फिर से सख्त प्रतिबंध लगा दिए जाएंगे।

आखिर इस नए समझौते में ऐसा क्या है जिसपर विवाद छिड़ा है

इस समझौते के तहत कुल 14 प्रमुख प्रावधान तय किए गए हैं। सबसे बड़ा विवाद ईरान के बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए 300 बिलियन डॉलर के फंड को लेकर है। रिपब्लिकन पार्टी के कई नेता इस बात से नाराज हैं कि ईरान को इतनी बड़ी राहत क्यों दी जा रही है। लुइसियाना के रिपब्लिकन सीनेटर बिल कैसिडी ने तो यहां तक कह दिया कि इस फैसले को देखकर रोनाल्ड रीगन अपनी कब्र में करवटें बदल रहे होंगे।

कैसिडी का तर्क है कि ईरान ने इस समझौते के बदले में कुछ खास नहीं खोया है। उनका मानना है कि प्रतिबंध हटने से ईरान फिर से मजबूत होगा और भविष्य में होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को बंद करने की धमकी देगा। कैसिडी अकेले नहीं हैं। सीनेटर टेड क्रूज़ भी मानते हैं कि ट्रंप को इस समझौते को लेकर गलत सलाह दी जा रही है।

लेकिन यहाँ एक बड़ा भ्रम दूर करना जरूरी है। ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि 300 बिलियन डॉलर का यह फंड अमेरिकी टैक्सपेयर्स के पैसे से नहीं आ रहा है। यह मुख्य रूप से निजी निवेशकों से आएगा। अमेरिकी सरकार सीधे तौर पर ईरान में कोई बड़ा निवेश नहीं कर रही है। यह जानकारी उन अफवाहों को खारिज करती है जो इस डील को अमेरिका की हार के रूप में पेश कर रही थीं।

रिपब्लिकन नेताओं की चिंताएं और ट्रंप का तीखा जवाब

पार्टी के भीतर से उठ रही आवाजें ट्रंप के लिए नई नहीं हैं। बिल कैसिडी उन सात रिपब्लिकन सीनेटरों में से एक थे जिन्होंने 6 जनवरी की घटना के बाद ट्रंप के महाभियोग के पक्ष में वोट दिया था। ट्रंप और कैसिडी के बीच पुराना राजनीतिक मुकाबला है। इसलिए ट्रंप का उन पर भड़कना अप्रत्याशित नहीं है।

टेड क्रूज़ जैसे नेताओं का कहना है कि प्रशासन ईरान को जरूरत से ज्यादा ढील दे रहा है। लेकिन ट्रंप का नजरिया अलग है। वे देखते हैं कि युद्ध जारी रहने से अमेरिकी सेना और अर्थव्यवस्था दोनों पर बोझ बढ़ रहा था। तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं जिससे अमेरिका में महंगाई बढ़ रही थी। ट्रंप के लिए घरेलू अर्थव्यवस्था को संभालना पहली प्राथमिकता है। जब वे देखते हैं कि समझौते के कारण गैस स्टेशनों पर आम जनता को कम पैसे चुकाने पड़ रहे हैं, तो उनके लिए आलोचकों की बातें बेमानी हो जाती हैं।

क्या सच में तेल की कीमतें गिरने से अमेरिकी जनता को फायदा होगा

हाँ, बिल्कुल होगा। जब तेल की कीमतें कम होती हैं, तो परिवहन की लागत घटती है। इसका सीधा असर रोजमर्रा की चीजों के दामों पर पड़ता है। शेयर बाजार का रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचना यह दिखाता है कि व्यापारिक जगत इस समझौते को सकारात्मक रूप से देख रहा है। अनिश्चितता का माहौल खत्म होने से निवेशकों का भरोसा बढ़ा है।

ईरान भी इस बात को समझता है कि अमेरिकी प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया था। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने पहले कड़े तेवर दिखाए थे, लेकिन वे भी जानते हैं कि आर्थिक संकट से बाहर निकलने का यही एकमात्र रास्ता है। दोनों पक्षों के लिए यह एक ऐसी मजबूरी थी जिसे समझौते का रूप दे दिया गया।

आगे का रास्ता और इस फैसले का वैश्विक असर

इस समझौते को पूरी तरह समझने के लिए हमें इसके दीर्घकालिक परिणामों को देखना होगा। यह समझौता अभी शुरुआती चरण में है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ईरान अपनी शर्तों पर कितना टिकता है। यदि ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण जारी रखा या परमाणु कार्यक्रम को चुपके से आगे बढ़ाया, तो यह डील तुरंत रद्द हो जाएगी।

यदि आप इस पूरे घटनाक्रम पर नजर रखना चाहते हैं और वैश्विक राजनीति में इसके असर को समझना चाहते हैं, तो इन व्यावहारिक कदमों का पालन करें।

  1. कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों (Brent Crude) पर नजर रखें क्योंकि यह इस समझौते की सफलता का सबसे बड़ा थर्मामीटर है।
  2. अमेरिकी शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव को देखें जिससे पता चलेगा कि आर्थिक जगत ट्रंप की नीतियों को कितना समर्थन दे रहा है।
  3. होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाले व्यापारिक जहाजों के आवागमन की खबरों पर ध्यान दें क्योंकि सुरक्षा की गारंटी ही इस डील की असली परीक्षा है।

राजनीति में कोई भी फैसला हर किसी को खुश नहीं कर सकता। ट्रंप ने हमेशा की तरह एक बड़ा जोखिम लिया है। यह जोखिम अमेरिका को आर्थिक मंदी से बचाने के लिए लिया गया है। जो लोग केवल पुरानी नीतियों के भरोसे बैठे हैं, वे बदलते वैश्विक परिदृश्य को नहीं समझ पा रहे हैं। ट्रंप का गुस्सा शायद इसी हताशा का परिणाम है।

EW

Ethan Watson

Ethan Watson is an award-winning writer whose work has appeared in leading publications. Specializes in data-driven journalism and investigative reporting.